सेकेंड लेफ़्टीनेंट राम राघोबा राणे (Second Lieutenant Rama Raghoba Rane)

सेकेंड लेफ़्टीनेंट राम राघोबा राणे (Second Lieutenant Rama Raghoba Rane)
सेकेंड लेफ़्टीनेंट राम राघोबा राणे (Second Lieutenant Rama Raghoba Rane)

नाम:- सेकेंड लेफ़्टीनेंट राम राघोबा राणे (Second Lieutenant Rama Raghoba Rane)
Father’s Name :- NA
Mother’s Name :- NA
Domicile :- NA
जन्म:- 26 जून 1918
जन्म भूमि :- चेंडियाकारवारकर्नाटकभारत
शहादत :- 11 जुलाई 1994 (उम्र 76)
शहादत स्थान :- पुणे, महाराष्ट्र
सेवा/शाखा :- भारतीय सेना
सेवा वर्ष :- 1947–1968
रैंक (उपाधि) :- सेकेंड लेफ्टिनेंट, बाद में मेजर
सेवा संख्यांक(Service No.) :- SS-14246
यूनिट :- बॉम्बे इंजीनियर्स
युद्ध/झड़पें :- भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947
सम्मान :-  परम वीर चक्र (1950)
नागरिकता :- भारतीय
अन्य जानकारी :- यह बाम्बे इंजीनियर्स से जुड़े हुए थे और इन्हें राजौरी को फिर से फ़तह करने के सम्बन्ध में याद किया जाता है।

जीवन परिचय

राघोबा राणे का जन्म 26 जून 1918 को धारवाड़ ज़िले के हवेली गाँव में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा, पिता के एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण (ट्रांसफ़र) के कारण बिखरी-बिखरी सी हुई। तभी 1930 में असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ जिससे राघोबा राणे बेहद प्रभावित हुए और ऐसा लगा कि वह इस आन्दोलन में सब कुछ छोड़कर कूद पड़ेंगे। लेकिन इस स्थिति के आने के पहले ही इनके पिता अपने परिवार सहित अपने पैतृक गाँव चेंडिया आ गए।

भारतीय सेना में भर्ती

1940 में दूसरा विश्व युद्ध तेज़ी पर था। राघोबा के भीतर भी कुछ जोश भरा जीवन जीने की चाह थी तो उन्होंने भारतीय सेना में जाने का मन बनाया। उनकी इच्छा रंग लाई और 10 जुलाई 1940 को वह बॉम्बे इंजीनियर्स में आ गए। वहाँ इनके उत्साह और दक्षता ने इनके लिए बेहतर मौक़े पैदा किए। यह अपने बैच के ‘सर्वोत्तम रिक्रूट’ चुने गए। इस पर इन्हें पदोन्नत करके नायक बना दिया गया तथा इन्हें कमांडेंट की छड़ी प्रदान की गई। ट्रेनिंग के बाद राघोबा 26 इंफेंट्री डिवीजन की 28 फील्ड कम्पनी में आ गए। यह कम्पनी बर्मा में जापानियों से लड़ रही थी। बर्मा से लौटते समय राघोषा राणे को दो टुकड़ियों के साथ ही रोक लिया गया और उन्हें यह काम सौंपा गया कि वह बुथिडांग में दुश्मन के गोला बारूद के जखीरे को नष्ट करें और उनकी गाड़ियों को बरबाद कर दें। राघोबा और उनके साथी इस काम को करने में कामयाब हो गए। योजना थी कि इसके बार नेवी के जहाज इन्हें लेकर आगे जाएंगे। दुर्भाग्य से यह योजना सफल नहीं हो पाई और उन लोगों को नदी खुद पार करनी पड़ी। यह एक जोखिम भरा काम था क्योंकि उस नदी पर जापान की जबरदस्त गश्त और चौकसी लगी हुई थी। इसके बावजूद राघोबा और उनके साथी, जापानी दुश्मनों की नज़र से बचते हुए उनको मात देते हुए इस पार आए और इन लोगों ने बाहरी बाज़ार में अपने डिवीजन के पास अपनी हाजिरी दर्ज की। यह एक बेहद हिम्मत तथा सूझबूझ का काम था, जिसके लिए इन्हें तुरंत हवलदार बना दिया गया।

सेकेंड लेफ़्टिनेंट

इसके बाद रामा राघोबा राणे लगातार सेना को अपनी बहादुरी, अपनी नेतृत्व क्षमता तथा अपने चरित्र से प्रभावित करते रहे जिसके फलस्वरूप इन्हें सेकेंड लेफ़्टिनेंट के रूप में कमीशंड ऑफिसर बनाकर जम्मू कश्मीर के मोर्चे पर तैनात कर दिया गया। पाकिस्तान के जवाबी हमले को नाकाम करते हुए नौशेरा की फ़तह के बाद भारतीय सेना ने अपनी नीति में परिवर्तन किया और यह तय किया कि वह केवल रक्षात्मक युद्ध नहीं लड़ेगी बल्कि खुद भी आक्रामक होकर मोर्चे जीतेगी और इसी से दुश्मन का मनोबल टूटेगा। इस क्रम में सबसे पहले 18 मार्च 1948 को 50 पैराब्रिगेड तथा 19 इंफेंट्री ब्रिगेड ने झांगार पर दुबारा जीत हासिल की थी। उसके बाद भारतीय सेना अपनी इसी नीति पर डटी रही थी। इसके बाद यह निर्णय हुआ था कि दुश्मन पर दबाव बनाए रखते हुए बारवाली रिज, चिंगास तथा राजौरी पर कब्जा जमाया जाय। इस काम के लिए नौशेरा-राजारी मार्ग का साफ़ होना बहुत ज़रूरी था। एक तो भौगोलिक रूप से यहाँ रास्ता पहाड़ी रास्तों की तरह संकरा तथा पथरीला था, दूसरे इस पर दुश्मन ने बहुत सी ज़मीनी सुरंगें भी बना रखीं थीं। कूच करने के पहले ज़रूरी था कि उन सुरंगों को नाकाम करके, सभी तरह के अवरोध वहाँ से हटा दिए जाएँ।

अदम्य साहस का प्रदर्शन

8 अप्रैल 1948 को ऐसे ही एक मोर्चे पर सेकेंड लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे को अपना पराक्रम दिखाने का मौका मिला। 8 अप्रैल 1948 को यह काम बॉम्बे इंजीनियर्स के इन्हीं सेकेंड लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे को सौंपा गया। दिन में काम शुरू हुआ और शाम तक रिज को फ़तह कर लिया गया। दुश्मन ने इस हार पर अपना जवाबी हमला किया लेकिन उसे नाकाम कर दिया गया। इस सफलता के लिए रामा राघोबा की विशेष बहादुरी का ज़िक्र किया जा सकता है। 8 अप्रैल से ही, जैसे ही रामा राघोबा को काम शुरू करना था, दुश्मन की भारी गोलाबारी तथा बमबारी शुरू हो गई थी। इस शुरुआती दौर में ही रामा राघोबा के दो जवान मारे गए और पाँच घायल हो गए। घायलों में रामा राघोबा स्वयं भी थे। इसके बावजूद रामा राघोबा अपने टैंक के पास से हटे नहीं और दुश्मन की मशीनगन तथा मोर्टार का सामना करते रहे। रिज जो जीत भले ही लिया गया था, लेकिन राघोबा को पूरा एहसास था कि दुश्मन वहाँ से पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ है। इसके बावजूद, रामा ने अपने दल को एकजुट किया और घुमाव बनाते हुए अपने टैंकों के साथ वह आगे चल पड़े। रात दस बजे वह एक-एक ज़मीनी सुरंग साफ़ करते हुए आगे बढ़ते रहे, जबकि दुश्मन की तरफ से मशीनगन लगातार गोलियों की बौछार कर रही थी।

बहादुरी और चतुराई का प्रदर्शन

अगले दिन 9 अप्रैल को फिर एकदम सुबह से ही काम शुरू हो गया जो शाम तीन बजे तक चलता रहा। इस बीच एक घुमावदार रास्ता तैयार था, जो सुरक्षित था और इससे टैंक आगे जा सकते थे। जैसे-जैसे सशस्त्र दल आगे बढ़ा, रामा राघोबा अगली पंक्ति में उनकी अगुवाई करते चले। रास्ते में फिर एक अवरोध चीड़ के पेड़ को गिरा कर बनाया गया था। राघोबा फुर्ती से अपने टैंक से कूद कर नीचे आए और पेड़ को धमाके से उड़ाकर उन्होंने रास्ता साफ़ कर लिया। क़रीब तीन सौ गज़ आगे फिर वहीं नज़ारा था। उस समय शाम ढल रही थी और रास्ता ज़्यादा घुमावदार होता जा रहा था। अगली बाधा एक उड़ा दी गई पुलिया ने खड़ी की थी। राघोबा अपने दल के साथ इसे भी दूर करने तत्परता से जुट गए। तभी यकायक दुश्मन ने मशीनगन से गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं लेकिन यहाँ भी राघोबा ने बेहद चतुराई से अपना रास्ता दूसरी तरफ से काटा और निर्बाध आगे बढ़ गए। इस तरह सशस्त्र सेना ने न जाने कितने मार्ग अवरोधों का सामना किया और सभी को रामा राघोबा के दल ने बहादुरी और चतुराई से निपटा डाला।

शाम सवा छह का समय हो रहा था। रोशनी तेज़ी से घट रही थी और सामने एक बड़ी बाधा मुँह बाए खड़ी थी। चीड़ के पाँच बड़े पेड़ों के सहारे मार्ग अवरोध बनाया गया था। उसके नीचे ज़मीनी सुरंगे थीं, जिसमें बारूदी विस्फोट का पूरा सामान था और उसके दोनों ओर से मशीनगर की लगातार गोलाबारी थी जिससे इस अवरोध को दूर कर पाना सरल नहीं लग रहा था। रामा राघोबा इस बाधा को भी हटाने के लिए तत्पर थे लेकिन सशस्त्र टुकड़ी के कमाण्डर को यही ठीक लगा कि टुकड़ी का रास्ता बदल कर कहीं सुरक्षित ठिकाने पर ले जाया जाए। इस निर्णय के साथ रात बीती लेकिन रामा राघोबा को चैन नहीं था। वह सुबह पौने पाँच बजे से ही उस मार्ग अवरोध को साफ़ करने में लग गए। दुश्मन की ओर से मशीनगन का वार जारी था। उसके साथ एक टैंक भी वहाँ तैनात हो गया था लेकिन रामा राघोबा का मनोबल भी कम नहीं था। वह इस काम में लगे ही रहे और सुबह साढ़े छह बजे, क़रीब पौने दो घण्टे की मशक्कत के बाद उन्होंने वह रास्ता साफ़ कर लिया और आगे बढ़ने की तैयारी शुरू हुई।

अगला हजार गज़ का फासला जबरदस्त अवरोधों तथा विस्फोटों से ध्वस्त तट-बंधों से भरा हुआ था। इतना ही नहीं, आगे का पूरा रास्ता मशीनगन की निगरानी में था लेकिन रामा राघोबा असाधारण रूप से शांत तथा हिम्मत से भरे हुए थे। उनमें जबरदस्त नेतृत्व क्षमता थी। वह अपनी टुकड़ी का हौसला बढ़ने में प्रवीण थे और अपनी टुकड़ी के सामने अपनी बहादुरी एवं हिम्मत की मिसाल भी रख रहे थे, जिसके दम पर उनका पूरा अभियान उसी दिन सुबह साढ़े दस बजे तक पूरा हो गया। सशस्त्र टुकड़ी को तो निकलने का रास्ता राघोबा ने दे दिया, लेकिन वह थमे नहीं। सशस्त्र टुकड़ी तावी नदी के किनारे रुक गई लेकिन राघोबा का दल प्रशासनिक दल के लिए रास्ता साफ़ करने में जुटा रहा। राघोबा के टैंक चिंगास तक पहुँच गए। रामा को इस बात का पूरा एहसास था कि रास्तों का साफ़ होना जीत के लिए बहुत ज़रूरी है, इसलिए वह अन्न-जल के, बिना विश्राम किये रात दस बजे तक काम में लगे रहे और सबेरे छह बजे से फिर शुरू हो गए। 11 अप्रैल 1948 को उन्होंने ग्यारह बजे सुबह तक चिंगास का रास्ता एक दम साफ़ और निर्बाध कर दिया। उनका काम अभी भी पूरा नहीं हुआ था। उसके बाद भी आगे का रास्ता उनको काम में लगाए रहा। रात ग्यारह बजे जाकर उनका काम पूरा हुआ।

सम्मान

सेकेंड लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे ने जिस बहादुरी धैर्य तथा कुशल नेतृत्व से यह काम पूरा किया और भारत को विजय का श्रेय दिलाया, उसके लिए उन्हें परमवीर चक्र प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्होंने स्वयं प्राप्त किया।

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सूबेदार एवं मानद कैप्टन करम सिंह (Subedar and Honorary Captain Karam Singh)

सूबेदार एवं मानद कैप्टन करम सिंह (Subedar and Honorary Captain Karam Singh)
सूबेदार एवं मानद कैप्टन करम सिंह (Subedar and Honorary Captain Karam Singh)

नाम:- सूबेदार एवं मानद कैप्टन करम सिंह (Subedar and Honorary Captain Karam Singh)
Father’s Name :- Late UTTAM SINGH
Mother’s Name :- Late SANTI KAUR
Domicile :- Barnala, Punjab
जन्म:- 20 जनवरी 1993
जन्म भूमि :- भालियाँ गाँव, पंजाब
शहादत :- 20 जनवरी 1993 (आयु- 77)
शहादत स्थान :- बरनाला, पंजाब
सेवा/शाखा :- ब्रिटिश भारतीय सेना, भारतीय सेना
सेवा वर्ष :- 1941–1969
रैंक (उपाधि) :- लांस नायक, बाद में मानद कैप्टन
सेवा संख्यांक(Service No.) :- 22356
यूनिट :- प्रथम बटालियन (1 सिख)
युद्ध/झड़पें :- द्वितीय विश्व युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947
सम्मान :-  परम वीर चक्र (1950-Republic Day), मिलिट्री मैडल (एमएम)
नागरिकता :- भारतीय
अन्य जानकारी :- जम्मू कश्मीर का युद्ध ही उनकी बहादुरी की कहानी नहीं कहता बल्कि उसके पहले वे दूसरे विश्व युद्ध में भी अपनी वीरता का परचम लहरा चुके थे, जिसके लिए इन्हें 14 मार्च 1944 को सेना पदक मिला और इस सम्मान के साथ ही इन्हें पदोन्नति देकर लांस नायक भी बनाया गया।

सैन्य जीवन

15 सितम्बर 1941 को उन्होंने सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन में दाखिला लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बर्मा अभियान के दौरानएडमिन बॉक्स की लड़ाई में उनके आचरण और साहस के लिए उन्हें मिलिट्री मैडल से सम्मानित किया गया था। एक युवा, युद्ध-सुसज्जितसिपाही के रूप में उन्होंने अपनी बटालियन में साथी सैनिकों से सम्मान अर्जित किया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947

1947 में भारत की आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान ने कश्मीरी रियासत के लिए लड़ाई लड़ी। संघर्ष के प्रारंभिक चरणों के दौरानपाकिस्तान के पश्तून आदिवासी सैन्य टुकड़ियों ने राज्य की सीमा पार कर दी तथा टिथवाल सहित कई गांवों पर कब्जा कर लिया। कुपवाड़ा सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर स्थित यह गांव भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। 23 मई 1948 को भारतीय सेना नेपाकिस्तानी सैनिकों से टिथवाल पर से कब्जा वापस ले लिया लेकिन पाकिस्तानी सेना ने क्षेत्र को फिर से प्राप्त करने के लिए एक त्वरितहमले शुरू कर दिए। पाकिस्तानी हमले के दौरान भारतीय सैनिक जो उस हमले का सामना करने में असमर्थ थे अपने स्थिति से वापसटिथवाल रिज तक चले गए और उपयुक्त पल के लिए तैयारी करने लगे।
चूंकि टिथवाल की लड़ाई कई महीनों तक जारी रही, पाकिस्तानियों ने हताश होकर 13 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिएताकि भारतीयों को उनकी स्थिति से हटाया जा सके। उनका प्राथमिक उद्देश्य टिथवाल के दक्षिण में स्थित रीछमार गली और टिथवालके पूर्व नस्तचूर दर्रे पर कब्जा करना था। 13 अक्टूबर की रात को रीछमार गली पर भयानक लड़ाई के दौरान लांस नायक करम सिंह 1सिख की अग्रिम टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। लगातार पाकिस्तानी गोलीबारी में सिंह ने घायल होते हुए भी सहस नहीं खोया और एकऔर सैनिक की सहायता से वह दो घायल हुए लोगों को साथ लेकर आए थे। युद्ध के दौरान वह सिंह एक स्थिति से दूसरी स्थिति पर जातेरहे और जवानों का मनोबल बढ़ाते हुए ग्रेनेड फेंकते रहे। दो बार घायल होने के बावजूद उन्होंने निकासी से इनकार कर दिया और पहलीपंक्ति की लड़ाई को जारी रखा। पाकिस्तान की ओर से पांचवें हमले के दौरान दो पाकिस्तानी सैनिक सिंह की स्थिति के करीब आ गए।मौका देखते ही सिंह खाई से बाहर उनपर कूद पड़े और संगीन (बैनट) से उनका वध कर दिया जिससे पाकिस्तानी काफी हताश हो गए।इसके बाद उन्होंने तीन और हमलों को नाकाम किया और सफलतापूर्वक दुश्मन को पीछे हटा दिया।

सम्मान

लांस नायक करम सिंह को भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947 के दौरान उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस 1950 के दिन परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma)

मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma)
मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma)
नाम:- मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma)
Father’s Name :- MAJ GEN A N SHARMA
Mother’s Name :- NA
Domicile :- KANGRA,HP
जन्म:- 31 जनवरी 1923
जन्म भूमि :- कांगड़ा, पंजाब प्रान्त, ब्रिटिश भारत
शहादत :- 3 नवम्बर, 1947 (आयु 24)
शहादत स्थान :- बदगाम, जम्मू और कश्मीर
सेवा/शाखा :- ब्रिटिश भारतीय सेना, भारतीय सेना
सेवा वर्ष :- 1942–1947
रैंक (उपाधि) :- मेजर
सेवा संख्यांक(Service No.) :- IC-521
यूनिट :- चौथी बटालियन, कुमाऊं रेजिमेंट
युद्ध/झड़पें :- द्वितीय विश्व युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947
सम्मान :-  परम वीर चक्र (1950-Republic Day)
नागरिकता :- भारतीय
सम्बंध :- जनरल वी एन शर्मा (भाई)
प्रसिद्धि :- ‘परमवीर चक्र’ पाने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा प्रथम व्यक्ति थे।
अन्य जानकारी :- सोमनाथ शर्मा के पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी भारतीय सेना में डॉक्टर थे और इनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे, जो 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे।

प्रारम्भिक जीवन

शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को दध, कांगड़ा में हुआ था, जो ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रान्त में था और वर्तमान में भारतीयराज्य हिमाचल प्रदेश में है। उनके पिता अमर नाथ शर्मा एक सैन्य अधिकारी थे।[a][3] उनके कई भाई-बहनों ने भारतीय सेना में अपनीसेवा दी उनके कई भाई सेना में रह चुके थे।

शर्मा ने देहरादून के प्रिन्स ऑफ़ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज में दाखिला लेने से पहले, शेरवुड कॉलेज, नैनीताल में अपनी स्कूली शिक्षापूरी की। बाद में उन्होंने रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट में अध्ययन किया। अपने बचपन में सोमनाथ भगवदगीता में कृष्ण और अर्जुन की शिक्षाओं से प्रभावित हुए थे, जो उनके दादा द्वारा उन्हें सिखाई गई थी।

सैन्य कैरियर

22 फरवरी 1942 को रॉयल मिलिट्री कॉलेज से स्नातक होने पर, शर्मा की नियुक्ति ब्रिटिश भारतीय सेना की उन्नीसवीं हैदराबादरेजिमेन्ट की आठवीं बटालियन में हुई (जो कि बाद में भारतीय सेना के चौथी बटालियन, कुमाऊं रेजिमेंट के नाम से जानी जाने लगी) उन्होंने बर्मा में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अराकन अभियान में जापानी सेनाओं के विरुद्ध लड़े। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरानउन्होंने अराकन अभियान बर्मा में जापानी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। उस समय उन्होंने कर्नल के एस थिमैया की कमान के तहतकाम किया, जो बाद में जनरल के पद तक पहुंचे और 1957 से 1961 तक सेना में रहे। शर्मा को अराकन अभियान की लड़ाई के दौरानभी भेजा गया था। अराकन अभियान में उनके योगदान के कारण उन्हें मेन्शंड इन डिस्पैचैस में स्थान मिला।

अपने सैन्य कैरियर के दौरान, शर्मा, अपने कैप्टन के॰ डी॰ वासुदेव की वीरता से काफी प्रभावित थे। वासुदेव ने आठवीं बटालियन के साथभी काम किया, जिसमें उन्होंने मलय अभियान में हिस्सा लिया था, जिसके दौरान उन्होंने जापानी आक्रमण से सैकड़ों सैनिकों की जानबचाई एवं उनका नेतृत्व किया।

बड़ग़ाम की लड़ाई :-मुख्य लेख: बड़ग़ाम की लड़ाई और 1947 का भारत-पाक युद्ध

27 अक्टूबर 1947 को, पाकिस्तान द्वारा 22 अक्टूबर को कश्मीर घाटी में आक्रमण के जवाब में भारतीय सेना के सैनिकों का एक बैचतैनात किया गया, जो भारत का हिस्सा था । 31 अक्टूबर को, कुमाऊँ रेजिमेंट की 4 थी बटालियन की डी कंपनी, शर्मा की कमान केतहत श्रीनगर पहुंची थी। इस समय के दौरान उनके बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़ा था जो हॉकी फील्ड पर चोट के कारण लगा था, लेकिनउन्होंने अपनी कंपनी के साथ युद्ध में भाग लेने पर जोर दिया और बाद में उन्हें जाने की अनुमति दी गई। 3 नवंबर को, गस्त के लिए, बड़गाम क्षेत्र में तीन कंपनियों का एक बैच तैनात किया गया था। उनका उद्देश्य उत्तर से श्रीनगर की ओरजाने वाले घुसपैठियों की जांच करना था। चूंकि दुश्मन की तरफ से कोई हरकत नहीं थी, दो तिहाई तैनात टुकड़ियाँ दोपहर 2 बजेश्रीनगर लौट गईं। हालांकि, शर्मा की डी कंपनी को 3:00 बजे तक तैनात रहने का आदेश दिया गया था।

परम वीर चक्र

21 जून 1947 को, श्रीनगर हवाई अड्डे के बचाव में ,3 नवम्बर 1947 को अपने कार्यों के लिए, परम वीर चक्र के शर्मा का पुरस्कार सेसम्मानित किया गया था [6]। यह पहली बार था जब इसकी स्थापना के बाद किसी व्यक्ति को सम्मानित किया गया था। संयोगवश, शर्माके भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर , परमवीर चक्र की डिजाइनर थी ।

विरासत

1980 में जहाज़रानी मंत्रालय, भारत सरकार के उपक्रम भारतीय नौवहन निगम (भानौनि) ने अपने पन्द्रह तेल वाहक जहाज़ों के नामपरमवीर चक्र से सम्मानित लोगों के सम्मान में उनके नाम पर रखे। तेल वाहक जहाज़ एमटी मेजर सोमनाथ शर्मा, पीवीसी 11 जून 1984को भानौनि को सौंपा गया। 25 सालों की सेवा के पश्चात जहाज़ को नौसनिक बेड़े से हटा लिया गया।

लोकप्रिय संस्कृति में

परम वीर चक्र विजेताओं के जीवन पर टीवी श्रृंखला का पहला एपिसोड, परम वीर चक्र (1988 ) ने 3 नवंबर 1947 के शर्मा के कार्यों कोशामिल किया था। उस प्रकरण में, उनका किरदार फारूक शेख द्वारा अभिनीत किया गया था। इस चेतन आनंद ने निर्देशित किया था।

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शौर्य चक्र (SHAURYA CHAKRA)

मेडल: गोलाकार और कांस्य निर्मित, 1.38 इंच का व्यास है । इस मेडल के अग्र भाग पर केन्द्र में अशोक चक्र की प्रतिकृति उत्कीर्ण है जो कमल माला से घिरी हुई है । इसके पश्च भाग पर हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में शौर्य चक्र उत्कीर्ण है, और ये रूपान्तरण कमल के दो फूलों द्वारा अलग-अलग हो रहे हैं ।

फीता: तीन खड़ी लाइनों द्वारा बराबर भागों में विभाजित हरे रंग का फीता ।

बार: यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता ऐसी वीरता का कार्य पुनः करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने के लिए पात्र बनाएगा तो फीते को जोड़े जाने के लिए ऐसे और वीरता के कार्य की पहचान बार द्वारा की जाएगी जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है । प्रदत्त प्रत्येक बार के लिए लघुचित्र में चक्र की एक प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते के साथ शामिल की ।

कीर्ति चक्र (KIRITI CHAKRA)

मेडल: गोलाकार और स्टैण्डर्ड सिल्वर निर्मित, 1.38 इंच का व्यास है । इस मेडल के अग्र भाग पर केन्द्र में अशोक चक्र की प्रतिकृति उत्कीर्ण है जो कमल माला से घिरी हुई है । इसके पश्च भाग पर हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में कीर्ति चक्र उत्कीर्ण है, और ये रूपान्तरण कमल के दो फूलों द्वारा अलग-अलग हो रहे हैं ।

फीता: दो नारंगी खड़ी लाइनों द्वारा तीन बराबर भागों में विभाजित हरे रंग का फीता

बार: यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता ऐसी वीरता का कार्य पुनः करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने के लिए पात्र बनाएगा तो फीते को जोड़े जाने के लिए ऐसे और वीरता के कार्य की पहचान बार द्वारा की जाएगी जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है । प्रदत्त प्रत्येक बार के लिए लघुचित्र में चक्र की एक प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते के साथ शामिल की जाएगी ।

अशोक चक्र (ASHOKA CHAKRA)

मेडलः गोलाकार, दोनों तरफ रिमों के साथ 1.38 इंच का व्यास और स्वर्ण-कलई का होगा । इसके अग्रभाग पर, इसके केन्द्र में अशोक चक्र की प्रतिकृति उत्कीर्ण होगी जिसके चारों ओर कमल-माला है । इसके पश्चभाग पर हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में “अशोक चक्र” शब्द उत्कीर्ण होंगे, दोनों रूपान्तरण दो कमल के फूलों से अलग-अलग हो रहे हैं ।

फीता: नारंगी खड़ी लाइन द्वारा दो बराबर भागों में विभाजित हरे रंग का फीता ।

बार: यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता ऐसी वीरता का कार्य पुनः करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने के लिए पात्र बनाएगा तो फीते को जोड़े जाने के लिए ऐसे और वीरता के कार्य की पहचान बार द्वारा की जाएगी जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है और प्रत्येक ऐसे तदनन्तर वीरतापूर्ण कार्य के लिए एक अतिरिक्त बार शामिल किया जाएगा । ऐसे प्रत्येक बार के लिए लघुचित्र में चक्र की एक प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते के साथ शामिल की जाएगी ।

वीर चक्र (VIR CHAKRA)

मेडलः गोलाकार और स्टैण्डर्ड सिल्वर निर्मित है और इसके अग्रभाग पर पांच कोनों वाला उभरा हुआ तारा उत्कीर्ण किया गया है जिसके कोने गोलाकार किनारों को छू रहे हैं । इसके केंद्र भाग में राज्य का प्रतीक (ध्येय सहित) उत्कीर्ण है जो उभरा हुआ है । तारा पॉलिश किया हुआ है और केन्द्र भाग स्वर्ण-कलई में है । इसके पश्च भाग पर हिन्दी और अंग्रेजी शब्दों के बीच में दो कमल के फूलों के साथ हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में वीर चक्र उत्कीर्ण किया गया है । इसकी फिटिंग घुमाऊ उभारयुक्त है ।

फीता: फीता आधा नीला रंग और आधा नारंगी रंग का है ।

बारः यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता पुनः ऐसी ही बहादुरी का कार्य करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने हेतु पात्र बनाता है तो आगे ऐसा बहादुरी का कार्य किसी बार द्वारा उस फीता / पट्टी में जोड़े जाने के लिए रिकार्ड किया जाएगा जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है । ऐसा कोई बार अथवा बार्स मरणोपरान्त भी प्रदान किया जा सकता है । प्रदत्त प्रत्येक बार के लिए, लघुचित्र में “चक्र” की प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते / पट्टी में सम्मिलित की जाएगी ।

महावीर चक्र (MAHA VIR CHAKRA)

मेडलः गोलाकार और स्टैण्डर्ड सिल्वर निर्मित है और इसके अग्रभाग पर पांच कोनों वाला उभरा हुआ तारा उत्कीर्ण किया गया है जिसके कोने गोलाकार किनारों को छू रहे हैं । इस मेडल का व्यास 1.38 इंच का है इसके केंद्र भाग में राज्य का प्रतीक (ध्येय सहित) उत्कीर्ण है जो उभरा हुआ है । तारा पॉलिश किया हुआ है और केन्द्र भाग स्वर्ण-कलई में है । इसके पश्च भाग पर हिन्दी और अंग्रेजी शब्दों के बीच में दो कमल के फूलों के साथ हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में महावीर चक्र उत्कीर्ण किया गया है । इसकी फिटिंग घुमाऊ उभारयुक्त है ।

फीता: फीता आधा सफेद रंग और आधा नारंगी रंग का है ।

बारः यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता पुनः ऐसी ही बहादुरी का कार्य करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने हेतु पात्र बनाता है तो आगे ऐसा बहादुरी का कार्य किसी बार द्वारा उस फीता / पट्टी में जोड़े जाने के लिए रिकार्ड किया जाएगा जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है । प्रदत्त प्रत्येक बार के लिए, लघुचित्र में “चक्र” की प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते / पट्टी में सम्मिलित की जाएगी ।

परम वीर चक्र (PARAM VIR CHAKRA)

परम वीर चक्र (PARAM VIR CHAKRA)
परम वीर चक्र (PARAM VIR CHAKRA)

मेडल : गोलाकार, कांस्य निर्मित, 1.38 इंच का व्यास और अग्रभाग पर केंद्र में उभरी हुई राज्य के प्रतीक ( ध्येय सहित ) के साथ “इन्द्र के वज्र” की चार प्रतिकृतियां । इसके पश्चभाग पर, इसमें हिन्दी और अंग्रेजी के बीच में दो कमल के फूलों के साथ हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में परम वीर चक्र उभरा हुआ होगा । इसकी फिटिंग घुमाऊ उभार युक्त होगी ।

फीताः सादा बैंगनी रंग का फीता.

बार: यदि कोई चक्र प्राप्तकर्ता पुनः ऐसी ही बहादुरी का कार्य करता है जो उसे चक्र प्राप्त करने हेतु पात्र बनाता है तो आगे ऐसा बहादुरी का कार्य किसी बार द्वारा उस फीता / पट्टी में जोड़े जाने के लिए रिकार्ड किया जाएगा जिसके द्वारा चक्र संलग्न हो जाता है । प्रदत्त प्रत्येक बार के लिए, लघुचित्र में “इंद्र के वज्र” की प्रतिकृति, इसे अकेले पहनते समय फीते / पट्टी में सम्मिलित की जाएगी ।

पुरस्कार के बारे में (Gallantry Awards)

स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी, 1950 को प्रथम तीन वीरता पुरस्कार अर्थात परम वीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र प्रारंभ किए गए थे, जिन्हें 15 अगस्त, 1947 से प्रभावी माना गया था

इसके पश्चात, भारत सरकार द्वारा दिनांक 4 जनवरी, 1952 को अन्य तीन वीरता पुरस्कार अर्थात अशोक चक्र श्रेणी – I, अशोक चक्र श्रेणी-II और अशोक चक्र श्रेणी-III प्रारंभ किए गए थे जिन्हें 15 अगस्त, 1947 से प्रभावी माना गया था । इन पुरस्कारों को जनवरी, 1967 में क्रमशः अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र के रूप में पुनः नाम दिया गया था।

ये वीरता पुरस्कार वर्ष में दो बार घोषित किए जाते हैं – गणतंत्र दिवस के अवसर पर और फिर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ।

इन पुरस्कारों का वरीयता क्रम परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र और शौर्य चक्र है ।

परम वीर चक्र (PARAM VIR CHAKRA)

महावीर चक्र (MAHAVIR CHAKRA)

वीर चक्र (VIR CHAKRA)

अशोक चक्र (ASHOKA CHAKRA)

कीर्ति चक्र (KIRTI CHAKRA)

शौर्य चक्र (SHAURYA CHAKRA)

अलंकरण समारोह (INVESTITURE CEREMONY)

कुछ अन्य रक्षा प्रतिष्ठित सेना पुरस्कारों के साथ वीरता पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक वर्ष राष्ट्रपति भवन में आयोजित रक्षा अलंकरण समारोह के अवसर पर पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं / उनके निकट संबंधियों (एनओके) को प्रदान किए जाते हैं । तथापि, परम वीर चक्र और अशोक चक्र राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड के अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कारप्राप्त कर्ताओं / उनके निकट संबंधियों को प्रदान किए जाते हैं ।